भारतीय संस्कृति में भाषा का महत्व : दार्शनिक ऐतिहासिक एवं समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य

Subject:Linguistics : Hindi \ Cultural Studies
Title:भारतीय संस्कृति में भाषा का महत्व : दार्शनिक ऐतिहासिक एवं समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य
Author(s):शिवा
Published on:30th August 2026
Published by:Lyceum India
Name of the Journal:Lyceum India Journal of Social Sciences
ISSN/e-ISSN:3048-6513
Volume & Issue:Volume: 3, Issue: 10
Pages:132-138
Original DOI (if any):10.5281/zenodo.22084193
Repository DOI: 
Abstract:भाषा केवल भावों या विचारों के आदान-प्रदान का यांत्रिक माध्यम मात्र नहीं है, अपितु यह किसी भी राष्ट्र, समाज और सभ्यता की सांस्कृतिक चेतना, दार्शनिक आधार और सामूहिक अस्मिता का प्राणतत्व होती है। भारतीय सांस्कृतिक के संदर्भ में भाषा को सृजन और ब्रह्म का स्वरूप माना गया है। प्रस्तुत विस्तृत शोध आलेख में इस बात का सूक्ष्म और अकादमिक विश्लेषण किया गया है कि किस प्रकार वैदिक काल से लेकर समकालीन वैश्वीकरण के युग तक भाषा ने भारतीय संस्कृति को गढ़ा है, संरक्षित किया है और लोक-व्यापी बनाया है।  संस्कृत की दार्शनिक विरासत, पाणिनि और भर्तृहरि का व्याकरण दर्शन, मध्यकालीन भक्ति आंदोलन की लोक-भाषाओं का लोकतांत्रिकीकरण, आधुनिक राष्ट्रीय पुनर्जागरण, स्वतंत्रता संग्राम में संपर्क भाषा की भूमिका, लोक साहित्य की जीवंतता, बहुभाषिता की संस्कृति तथा वैश्वीकरण के दौर में भाषा के समक्ष उत्पन्न अस्तित्वगत चुनौतियों का इस शोध पत्र में व्यापक विस्तार के साथ अध्ययन किया गया है। इसके अतिरिक्त, इस आलेख में इस तथ्य पर विशेष प्रकाश डाला गया है कि भाषा किस प्रकार मनुष्य के आंतरिक मनोविज्ञान, उसकी नैतिक दृष्टि, पारिवारिक संस्कारों और सामाजिक समरसता को संचालित करती है। मौखिक परंपरा यानी ‘श्रुति’ के माध्यम से ज्ञान के अकाट्य संचरण से लेकर आधुनिक डिजिटल युग में क्षेत्रीय बोलियों के संरक्षण तक के आयामों को इसमें शामिल किया गया है। भारतीय मनीषियों के अनुसार, शब्दब्रह्म की उपासना ही वास्तविक सांस्कृतिक साधना है, क्योंकि भाषा के नष्ट होने से केवल शब्दकोश नहीं मिटता, बल्कि पूरी की पूरी सभ्यता का इतिहास और उसका भविष्य अंधकारमय हो जाता है। अतः यह शोध पत्र भाषा और संस्कृति के अद्वैत संबंध को नए तार्किक और दार्शनिक तर्कों के साथ रेखांकित करता है।
Keywords:संस्कृति, भाषा, समाजशास्त्र
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