| Subject: | Literature (Hindi) |
| Title: | भारतीय लोक साहित्य व धार्मिक साहित्यों में निषादों का वर्णन |
| Author(s): | डॉ. अभिषेक त्रिपाठी & दिनेश चन्द्र |
| Published on: | 30th September 2025 |
| Published by: | Lyceum India |
| Name of the Journal: | Lyceum India Journal of Social Sciences |
| ISSN/E-ISSN: | 3048-6513 |
| Volume & Issue: | Volume: 2, Issue: 4 |
| Pages: | 102-106 |
| Original DOI (if any): | 10.5281/zenodo.17222832 |
| Repository DOI: | |
| Abstract: | भारतीय सामाजिक संरचना का निर्माण मूलतः ग्रामीण एवं शहरी समुदायों में निवास करने वाली हजारों जातियों एवं उपजातियों से हुआ है। विभिन्न धार्मिक समूह या सम्प्रदाय (पन्थ) इन्ही जातियों के बीच क्रीड़ा करते हुए दिखाई देते है। यही कारण है कि भारतीय समाज को अक्सर “एक जातिगत समाज” कहकर परिभाषित कर दिया जाता है। यहां के लोगो की मूल पहचान जाति की रही है। वे पहले अपनी जाति के होते हैं और बाद में बौद्ध, जैन,सिक्ख, वैष्णव अथवा हिन्दू के रूप में उनकी पहचान बनती है। यहां मुसलमान और इसाई भी धार्मिक समूह के अर्थ में कम, जाति के अर्थ में अधिक पहचाने जाते है। भारत में जब विश्व की प्राचीनतम पुस्तक ऋग्वेद की कविताओं (ऋचाओं) में जाति के संकेत मिलते है। वहां पर जाति के लिए ’ज्ञाति’ तथा ’सजात’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है। वेदों में कर्मकार (लोहार), नापित (नाई), कूर्मि (कृषक), निषाद (मल्लाह), चर्मकार जैसी जातियों का उल्लेख हुआ है। ब्राहम्ण ग्रन्थ और धर्मसूत्र तो जैसे जातीय निषेधों एवं अधिकारों की सीमा रेखा खींचते हुए दिखायी देते हैं। रामायण, महाभारत तथा अन्य इतिहास ग्रन्थों में जाति व्यवस्था तथा उसके अधिकार एवं कर्तव्यों के साथ ही निषेधों का स्पष्ट क्रियात्मक रूप देखने को मिलता है। स्मृति ग्रन्थ तो जैसे वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था की रक्षा के लिये विधि विधान अथवा संविधान के रूप थे। जैन तथा बौद्ध धर्म एवं चार्वाक दर्शन का उदय ही ब्राहम्णवादी जातीय तथा धार्मिक व्यवस्थाओं के विरूद्ध एक क्रान्तिकारी आन्दोलन के रूप में हुआ था। चाणक्य द्वारा अर्थशास्थ की रचना में जाति का विचार किया गया है। पुराण सहित अन्य अनेक प्राचीन धार्मिक साहित्य में जाति एवं वर्ण के अधिकार तथा निषेधों की व्यवस्था एवं उनके सुरक्षा की योजना दिखाई देती है, जहां राजा के महत्वपूर्ण कार्यों में जाति एवं वर्ण की रक्षा करना उनका प्रमुख कार्य था। |
| Keywords: | बौद्ध, जैन, सिक्ख, वैष्णव कर्मकार (लोहार), नापित (नाई), कूर्मि (कृषक), निषाद (मल्लाह), चर्मकार |
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