| Abstract: | यह शोध-पत्र समकालीन हिंदी कविता के उस अप्रतिम और गतिशील परिदृश्य का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जो पारंपरिक मुद्रित माध्यमों (पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं और समाचार पत्रों) से निकलकर डिजिटल स्क्रीन—विशेषकर इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉर्ट्स, फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से विकसित हो रहा है। प्रिंट संस्कृति से डिजिटल संस्कृति तक की यह संक्रमणकालीन यात्रा केवल माध्यम का परिवर्तन मात्र नहीं है, बल्कि यह कविता की अंतर्वस्तु, शिल्प, लय, बिंब-विधान, श्रुति-संवेदना और उसके संज्ञापन के संपूर्ण व्याकरण को आमूल-चूल रूपांतरित कर रही है। पंद्रह से तीस सेकंड के डिजिटल अटेंशन के इस दौर में ‘लघु-कविता’ का एक नया और क्रांतिकारी प्रारूप उभरा है, जहाँ दृश्य, ध्वनि, सुलेख और शब्द मिलकर एक संयुक्त और बहुआयामी काव्यात्मक अनुभव रचते हैं। यह शोध इस बात का गंभीर परीक्षण करता है कि यह डिजिटल काव्यांदोलन किस प्रकार हिंदी साहित्य के अकादमिक और पारंपरिक मानदंडों को चुनौती दे रहा है, और समकालीन समाजशास्त्र, बाजारवाद तथा जनसंचार के अंतर्संबंधों को किस दिशा में ले जा रहा है। |
| Keywords: | डिजिटल युग, हिंदी कविता, लघु-कविता, सोशल मीडिया संस्कृति, रील्स और शॉर्ट्स, डिजिटल समाजशास्त्र, विजुअल पोएट्री, एल्गोरिथमिक सौंदर्यशास्त्र, काव्यात्मक शिल्प |