| Abstract: | 21वीं सदी में वैश्विक विकास की चुनौतियाँ जैसे गरीबी, असमानता, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक अस्थिरताकृने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को एक समावेशी और सतत विकास मॉडल की आवश्यकता का अहसास कराया है। इसी संदर्भ में United Nations द्वारा प्रस्तुत सतत विकास लक्ष्य एक व्यापक वैश्विक एजेंडा के रूप में उभरे हैं, जिनका उद्देश्य 2030 तक एक न्यायपूर्ण, समावेशी और सतत विश्व व्यवस्था की स्थापना करना है। यह शोध-पत्र भारतीय प्राचीन दार्शनिक अवधारणा “सर्वे भवन्तु सुखिनः” और SDGs के बीच अंतर्संबंध का विश्लेषण करता है। “सर्वे भवन्तु सुखिनः” का मूल भाव समस्त मानवता के सुख, स्वास्थ्य और कल्याण की कामना करना है, जो इसे एक सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत बनाता है। अध्ययन यह दर्शाता है कि यह अवधारणा ैक्ळे के मूल सिद्धांतकृविशेषकर “किसी को पीछे न छोड़ना”कृके साथ गहराई से जुड़ी हुई है। शोध में यह तर्क प्रस्तुत किया गया है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में पारंपरिक शक्ति-केन्द्रित दृष्टिकोण के स्थान पर एक नैतिक और मानवीय दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसे “सर्वे भवन्तु सुखिनः” प्रभावी रूप से प्रस्तुत करता है। यह अवधारणा SDGs 1 (गरीबी उन्मूलन), SDGs 10 (असमानता में कमी) और SDGs 16 (शांति एवं न्याय) के साथ विशेष रूप से संबद्ध है। अंततः यह अध्ययन निष्कर्ष निकालता है कि भारतीय दार्शनिक विचार और SDGs परस्पर पूरक हैं जहाँ एक नैतिक आधार प्रदान करता है, वहीं दूसरा उसे व्यावहारिक रूप देता है। इस प्रकार, दोनों का समन्वय एक अधिक समावेशी, न्यायपूर्ण और सतत वैश्विक व्यवस्था की स्थापना में सहायक हो सकता है। |