भारत में पंचायती राज व्यवस्था

Subject:Public Administration \ Sociology
Title:भारत में पंचायती राज व्यवस्था
Author(s):न्याज अहमद खां
Published on:30th May 2026
Published by:Lyceum India
Name of the Journal:Lyceum India Journal of Social Sciences
ISSN/E-ISSN:3048-6513
Volume & Issue:Volume: 3, Issue: 7
Pages:82-92
Original DOI (if any):10.5281/zenodo.20391433
Repository DOI: 
Abstract:भारत में पंचायती राज व्यवस्था स्थानीय स्वशासन, लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण और ग्रामीण विकास की आधारभूत संस्था के रूप में विकसित हुई है। इसकी जड़ें भारतीय इतिहास की प्राचीन ग्राम-व्यवस्था में दिखाई देती हैं, जहाँ पंचायतें स्थानीय प्रशासन, सामाजिक विवादों के समाधान तथा सामुदायिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं। स्वतंत्रता के पश्चात् लोकतांत्रिक शासन को जमीनी स्तर तक पहुँचाने के उद्देश्य से पंचायती राज व्यवस्था को पुनर्गठित करने के प्रयास किए गए। सामुदायिक विकास कार्यक्रम की सीमाओं के पश्चात् बलवंत राय मेहता समिति, अशोक मेहता समिति, जी. वी. के. राव समिति, एल. एम. सिंघवी समिति तथा पी. के. थुंगन समिति जैसी विभिन्न समितियों ने पंचायती राज संस्थाओं को अधिक प्रभावी एवं सशक्त बनाने के लिए महत्वपूर्ण सुझाव प्रस्तुत किए। इन प्रयासों का निर्णायक परिणाम 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 के रूप में सामने आया, जिसके माध्यम से पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्राप्त हुआ और संविधान में भाग-9 तथा ग्यारहवीं अनुसूची को जोड़ा गया। इस व्यवस्था के अंतर्गत ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद के रूप में त्रिस्तरीय स्थानीय शासन की संरचना विकसित की गई। प्रस्तुत लेख में पंचायती राज व्यवस्था के ऐतिहासिक विकास, संवैधानिक आधार, संगठनात्मक संरचना, कार्य एवं शक्तियों तथा वित्तीय स्रोतों का विश्लेषण किया गया है। साथ ही, ग्रामीण विकास, जनभागीदारी, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण में पंचायती राज संस्थाओं की भूमिका को रेखांकित किया गया है। अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि ग्रामीण क्षेत्रों के समावेशी और सतत विकास तथा लोकतांत्रिक शासन को मजबूत करने के लिए पंचायती राज संस्थाओं का प्रभावी, उत्तरदायी और सशक्त होना आवश्यक है।
Keywords:पंचायती राज, स्थानीय स्वशासन, लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण, ग्राम पंचायत, ग्रामीण विकास
 Download PDF

Leave a Reply